जीवन की सच्चाई
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1. खुद की नजरों में अच्छा बनें!
हमको खुद की नजरों में अच्छा बनना चाहिए |किसी की नजरों में अच्छा बनने में क्यों लगे हो, खुद की नजरों में अच्छा बनो लोगों की नजरें अपने आप अच्छी बन जाएंगी! ऐ दुनिया ही ऐसी है कामयाब लोगों को देखकर जलती है और नाकामयाब लोगों को देखकर हस्ती है! कभी भी किसी भी काम को करने से पहले ऐ मत सोंचो की चार लोग क्या कहेँगे, चार लोग तो अंत में यही कहेँगे की राम नाम सत्य है! अतः मेरे दोस्तों सुनो सबकी और करो अपने आपकी जो तुम्हारा मन करें!
किसी कवि ने कहा है की-
उठ जाग मुसाफिर भोर भई,
अब रैन कहाँ जो सोवत है!
जो सोवत है ओ खोवत है
जो जागत है ओ पावत है!
मतलब की इसमें साफ - साफ लिखा है की अगर हम यूँ ही सोते रह गये तो हमारी जिंदगी केवल सोने में ही निकाल जाएगी और हम अपनी जिंदगी में कभी भी सफलता हांसिल नहीं कर सकते हैं | यूँ ही नहीं मिल जाती है जिंदगी में सफलता एक अच्छा दिन बनाने के लिये कई रातें जागनी पडती हैं!
3. मजबूत होने का मजा तभी आता है, जब सारी दुनिया आपको कमजोर करने पर तुली हो |
अगर जिंदगी में आप अकेला महसूस कर रहें हो तो बंद कर दीजिए ऐसा करना और खुद पर विश्वास कीजिये तथा खुद को मजबूत बनाइये क्योंकि इस दुनिया में लोग तो चाहते हैं की आप बेहतर करें लेकिन ऐ भी सत्य है की ओ कभी नहीं चाहेंगे की आप उनसे बेहतर करें! गलत को गलत कहने की हिम्मत रखो चाहे वाले अपना ही क्यों न हो और अच्छा को अच्छा कहने की हिम्मत रक्खो चाहे वह पराया ही कईं न हो!
जिंदगी में जितने का मजा तभी आता है जब लोग आपके हारने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हों और आप जीत जाएँ !
4. एक कहानी मेरी जुबानी से!
एक आदमी था, जो हमेशा अपने संगठन में सक्रिय रहता था उसको सभी जानते थे बड़ा मान सम्मान मिलता था, अचानक किसी कारण वश वह निश्क्रिय रहने लगा , मिलना - जुलना बंद कर दिया ,और संगठन से दूर हो गया।*
*कुछ सप्ताह पश्चात् एक बहुत ही ठंडी रात में उस संगठन के मुखिया ने उससे मिलने का फैसला किया ।*
*मुखिया उस आदमी के घर गया और पाया कि आदमी घर पर अकेला ही था। एक बोरसी में जलती हुई लकड़ियों की लौ के सामने बैठा आराम से आग ताप रहा था। उस आदमी ने आगंतुक मुखिया का बड़ी खामोशी से स्वागत किया।*
*दोनों चुपचाप बैठे रहे। केवल आग की लपटों को ऊपर तक उठते हुए ही देखते रहे।*
*कुछ देर के बाद मुखिया ने बिना कुछ बोले, उन अंगारों में से एक लकड़ी जिसमें लौ उठ रही थी (जल रही थी) उसे उठाकर किनारे पर रख दिया। और फिर से शांत बैठ गया।*
*मेजबान हर चीज़ पर ध्यान दे रहा था। लंबे समय से अकेला होने के कारण मन ही मन आनंदित भी हो रहा था कि वह आज अपने संगठन के मुखिया के साथ है।*
*लेकिन उसने देखा कि अलग की हुए लकड़ी की आग की लौ धीरे धीरे कम हो रही है। कुछ देर में आग बिल्कुल बुझ गई। उसमें कोई ताप नहीं बचा। उस लकड़ी से आग की चमक जल्द ही बाहर निकल गई।*
*कुछ समय पूर्व जो उस लकड़ी में उज्ज्वल प्रकाश था और आग की तपन थी वह अब एक काले और मृत टुकड़े से ज्यादा कुछ शेष न था।*
*इस बीच.. दोनों मित्रों ने एक दूसरे का बहुत ही संक्षिप्त अभिवादन किया, कम से कम शब्द बोले।*
*जानें से पहले मुखिया ने अलग की हुई बेकार लकड़ी को उठाया और फिर से आग के बीच में रख दिया। वह लकड़ी फिर से सुलग कर लौ बनकर जलने लगी, और चारों ओर रोशनी और ताप बिखेरने लगी।*
*जब आदमी, मुखिया को छोड़ने के लिए दरवाजे तक पहुंचा तो उसने मुखिया से कहा मेरे घर आकर मुलाकात करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।*
*आज आपने बिना कुछ बात किए ही एक सुंदर पाठ पढ़ाया है। कि अकेले व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता, संगठन का साथ मिलने पर ही वह चमकता है और रोशनी बिखेरता है संगठन से अलग होते ही वह लकड़ी की भाँति बुझ जाता है।*
*संगठन से ही हमारी पहचान बनती है इसलिए संगठन हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिये!*
आपका अपना विकेश रावत गोण्डा उत्तर प्रदेश से!
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